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गीता में पुरुषार्थ चतुष्टय|

 श्री हरी:
श्री गणेशाय नम:

 जगतः पितरं शम्भुञ्जगतो मातरं शिवाम् ।
तत्पुत्रश्च गणाधीशं नत्वैतद्वर्णयाम्यहम्।।

“जगत्पिता शिवको तथा जगन्माता पार्वतीको और उनके पुत्र गणेशको नामनकर अभिमत सिद्धान्तका मैं वर्णन कर रहा हूँ।।”
(शिवपुराण- रुद्रसंहिता १.१.४)

पूज्य शंकराचार्य जी का लघु ग्रंथ गीता में पुरुषार्थ चतुष्टय सच में अद्भुत है। गीता तो स्वयं ही परम पुरुष श्री कृष्ण के द्वारा कही गई है जो स्वयं ही परम पुरुषार्थ मोक्ष तक पहुंचाने वाली है। गीता में  चार पुरुषार्थ तत्वों की व्याख्या पूज्य महाराज श्री स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने अपनी इस किताब में करी है

जैसा आप समझ और हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयोगी है। अंत के कुछ प्रश्नों में महाराज पुरी शंकराचार्य जी ने अपने इस अनुपम ग्रंथ में स्पष्ट किया है|
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।।’

(गीता २.३१)

इस भगवद्वचनके अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है कि धर्मकी सिद्धि कर्मानुष्ठानसे होती है।

‘नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।

                   शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः ।।‘ (गीता ३.८)

इस भगवद्वचनके अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है कि अर्थकी सिद्धि कर्मरूप उद्योगसे होती है।

              ‘विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।’ (गीता १८.३८)

इस भगवद्वचनके अनुशीलनसे यह तथ्य सिद्ध है कि कामकी सिद्धि अभीष्ट विषयेन्द्रियसंयोगसे होती है।

इस प्रकार धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धि कर्माधीन है। कर्मसाध्य धर्म, अर्थ और कामका पर्यवसान मोक्षसाधन तत्त्वज्ञान है।

यह ग्रंथ चारों पुरुषार्थ ओं के लिए चार अध्याय में अलग-अलग है जिनमें पहला अध्याय स्वभाविक रूप से धर्म ही है। कारण यह है कि

“गीता के अंदर धर्म आदि शब्दों का अन्य स्थलों पर भी प्रयोग किया गया है। तथापि इन की परिभाषा साक्षात सुलभ नहीं है। पुरुषार्थ चतुष्टय की परिभाषा और सार गंभीर मीमांसा पूज्य महाराज श्री स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी ने करी है।”

मुख्य कारण यह है कि सारे दुखों को दूर करके अनंत सुख प्राप्त करना सब की अभिलाषा होती है। परंतु अर्थ और काम में तो सब की प्रवृत्ति है। सब को पैसा चाहिए। पैसे से बढ़िया-बढ़िया गाड़ी बंगला ऐश्वर्या आराम  चाहिए। पर जो अगले दो पुरुषार्थ हैं धर्म और मोक्ष उसके प्रति सामान्य जनों का आकर्षण कम। ही होता है धर्म और मोक्ष उसी को  उसी को प्रिय है जिसकी वेदादी शास्त्रों में पूर्ण आस्था है। परंतु अज्ञान अंधकार से दूर हटकर अगर हम सच में अर्थ का अनर्थ होने से रोकने और काम को भी मोक्ष का साधन बना ले तो एक तीर से दो शिकार हो जाएंगे। यह परंतु यह होगा तभी जब हम इसे वो की तरह नहीं पुरुषार्थ के रूप में अंगीकार करेंगे। वह कैसे होगा? आइए जानते हैं|

धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके विषयमें जो कुछ महाभारतमें कहा गया है, वही अन्यत्र है; जो इसमें नहीं है, वह अन्यत्र भी नहीं है, अर्थात् इसमें विज्ञेय सर्व तथ्योंका वर्णन सुलभ है।

धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ ।
यदिहास्ति तदन्यत्र यत्रेहास्ति न तत् क्वचित् ।।

(महाभारत आदिपर्व ६२.५३)

धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ ।
                                            यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित् । । (महाभारत स्वर्गारोहणपर्व ५.५०)

महाभारतका हृदय होनेके कारण श्रीमद्भगवद्गीतामें पुरुषार्थचतुष्टयका सूत्रशैलीमें निरूपण सुलभ है।

अब इतना तो पता चल गया कि महाभारत में ही धर्म अर्थ काम मोक्ष चतुर पुरुषार्थ का निरूपण है। वस्तुतः श्रीमद्भगवद्गीता जो महाभारत का हृदय है, उसमें पुरुषार्थ चतुष्टय निरूपण सूत्र शैली में है।

‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः’ (३.३५) आदि स्थलोंमें स्वकर्मको स्वधर्म कहा गया है; अतः कर्म धर्म है। पर कर्म क्या है? वेद अभिव्यक्त (वेदसम्मत) कर्म धर्म है –

‘कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्’
(गीता ३.१५) ।

प्राणियोंके अस्तित्व और आदर्शका उद्भव जिससे हो, ऐसा विसर्गरूप सेवा, समर्पण, संयम और त्याग ‘कर्म’ अर्थात् ‘धर्म’ है-
‘भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्ज्ञितः’
(गीता. ८.३) ।

सर्वपोषण में प्रयुक्त तथा विनियुक्त त्यागमय तपोमय जीवनका प्रेरक तथा प्रकाशक सनातन धर्म है.

धर्म की परिभाषा मत्स्य पुराण में इस प्रकार है।

धर्मेति धारणे धातुर्माहात्म्ये चैव पठ्यते ।
धारणाच्च महत्त्वेन धर्म एष निरुच्यते ।।
(मत्स्यपुराण १३४.१७)

“धृ धातु धारण पोषण और महत्त्वके अर्थमें प्रयुक्त होती है। इसी धातुसे ‘धर्म’ शब्द निष्पन्न हुआ है। महत्त्वशील और धारक होनेके कारण यह ‘धर्म’ कहा जाता है।।” –

वास्तव में धर्म का वास्तव फल मोक्ष है। वास्तव में महाराज श्री पुरी पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने अपनी इस किताब में एक और बहुत अच्छा उदाहरण महाभारत शांति पर्व। से दिया है|

धारणाद् धर्ममित्याहुर्धर्मेण विधृताः प्रजाः ।
यः स्याद् धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ।।
(महाभारत शान्तिपर्व १०९. ११)

“धर्म धारण करता है, अर्थात् अस्तित्व और आदर्शकी रक्षाकर अधोगति से बचाता है, इसलिए उसे धर्म कहा गया है। धर्मने ही सारी प्रजाको धारण कर रक्खा है। अतः जिससे धारण और पोषण सिद्ध होता हो, वही धर्म है, ऐसा सत्पुरुषोंका निश्चय है।।”

अपध्यानमलो धर्मो मलोऽर्थस्य निगूहनम्।
सम्प्रमोदमलः कामो भूयः स्वगुणवर्जितः ।।
(महाभारत शान्तिपर्व १२३.१०)

“अर्थ, धर्म और कामको वास्तव पुरुषार्थका रूप प्रदान करनेके लिये तीनोंके मलका शोधन आवश्यक है। फलेछा धर्मका मल है. सग्रह अर्थका मल है. आमोद और प्रमोद कामका मल है।।”

महाराज श्री स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी ने यह सिद्ध किया है कि आजकल के समाज में जहां अति महत्वकांक्षी संपन्न व्यक्ति ही हर तरफ है। जहां विषयों  को ही सुख का एकमात्र साधन माना जाता है। वहां धर्म जो विषय लंपटता का ( विषय वासनाओं में पड़ा रहना ) आदि इसका विरोध करता है और मोक्ष बहिर्मुखी मतलब Extrovert लोग जो पार्टी पैसा दारू डिस्को की चपेट में पड़े हैं और द्वैत बुद्धि  यह मैं हूं। यह मेरा और यह तू है। यह तेरा ऐसा भाव जिनके मन में होता है, वे लोग मोक्ष को कभी प्राप्त करना तो दूर। मोक्ष के बारे में सोच भी नहीं सकते। वस्तुतः धर्म और मोक्ष महायांत्रिक युग में विलुप्त पुरुषार्थ  हो गए हैं महाराज श्री ने निर्देश करा है।
अनाधिकार चेष्टा, कालातिक्रम, देशातिक्रम, पात्रातिक्रम, दम्भ, द्रोह, अभिमान, ख्याति, असंयम, मिथ्या आहार-विहार, देवता- पितर-परलोक- परमेश्वर – परोपकार- पूर्वजन्म- पुनर्जन्ममें अनास्था, परोत्कर्षकी असहिष्णुता, आलस्य, असत्य और अधैर्यरूप पन्द्रह दोषोंसे विमुक्त रखना आवश्यक है।

महाराज श्री गोवर्धनमठ के शंकराचार्य जी ने इस ग्रंथ में भी सिद्ध किया है कि वेदादी वर्णाश्रम व्यवस्था मान कर पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि संभव है। इसी के साथ धर्म पुरुषार्थ समाप्त हुआ।

   अर्थ पुरुषार्थ

अर्थ की परिभाषा करते हुए महाराज स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती सबसे पहले तो परम अर्थ, परमात्मा, बाद में पृथ्वी आदि सामग्री को अर्थ रूप में परिभाषित करते हैं, जिसमें महाराज श्री बताते हैं। स्वास्थ्य अच्छा करने के लिए रोगों का शरीर से दूर होना आवश्यक है। उसी तरह अक्षय (कभी ना खत्म होने वाला ) सुख प्राप्त करने के लिए दुख का नाश करना आवश्यक है। इतना होने के बाद आत्मस्वरूप परमात्मा ( शिवोहम शिवोहम ) का ध्यान करते हुए अनात्म वस्तूओं से दूर होना मुक्ति है। परंतु परंतु परंतु मुक्ति के लिए चित्त शुद्धि, मन की शुद्धि, (वायरस, फ्री सॉफ्टवेयर) तथा समाधि आत्मतत्व में कंसंट्रेशन जरूरी है और। यह होगा स्वधर्म का पालन करने करके ही और धर्म में आगे तभी बढ़ेंगे जब न्याय पूर्वक धन उपार्जन करेंगे तो अर्थ उपार्जन का यह महत्व है।
ध्यान रहे; चोरी, हिंसा, अनृत (झूठ), दम्भ, काम, क्रोध, गर्व, मद, भेद (फूट), वैर, अविश्वास, स्पर्द्धा, लम्पटता, द्यूत (जुआ) और मद्य (मदिरा) रूप पन्द्रह अनर्थोके चपेटसे अर्थको विमुक्त रखने पर अर्थ पुरुषार्थ मान्य है; अन्यथा अर्थ अनर्थ ही सिद्ध हैl अब अगला है काम पुरुषार्थ

      काम पुरुषार्थ

महाराज श्री इसकी परिभाषा में लिखते हैं , कि पदार्थ की प्राप्ति की इच्छा उसकी प्राप्ति और उसके उपभोग से प्राप्त सुख का नाम है। ‘काम’
वास्तव में पाई नापाई वस्तु की जो मन में इच्छा होती है, उसे प्राप्त करने कि उसे कंट्रोल केवल आत्मबल से करा जा सकता है। आत्म बल जब आता है जब काम भी धर्म से नियंत्रित हो वरना काम काम तमाम कर ही देता है। वास्तव में अद्वुतीय परमात्मा (शिवोहम शिवोहम) को अज्ञान। के वशीभूत होकर अर्थात यह मानकर कि मैं शिव से अलग हूं मान लेने पर बुद्धि विषयों के प्रति आकर्षित होती और विषयों के प्रति जब मन प्रबल आकर्षित होता है। तब उन भोगों का चिंतन भी मन करता ही है और हम जिसके बारे में सोचते हैं, और ये भी सच ही है हम जिसके बारे में सोचते हैं मन उसी का हो जाता है। यह भी सही ही है अर्थात विषय के प्रति आसक्त हो जाती। है यही काम का मुख्य कारण है और काम अधिक होने से क्रोध भी होना स्वभाविक है। जिस प्रकार प्रणयकाल में हाथी कामआतुर होता है तब वह सबसे ज्यादा खतरनाक होता है।
खैर जहां काम क्रोध, दोनों हो वहां काम का मतलब भोग प्राप्त करने से है जहां काम क्रोध और लोभ तीनों हैं वहां आदमी के मन में स्त्री के प्रति स्त्री के मन में पुरुष के प्रति आकर्षण होता है। यहां लोभ का मतलब परस्पर मिलन की भावना आदि है।

” स्थानभेदसे मृदु – मध्यम – तीव्र स्पर्शकी अनभिज्ञतारूपा अरसिकता, असंयम, निन्दा, वाचालता, अश्लीलता, मदविह्वलता, अभक्ष्यभक्षण, अतिसामीपता, अतिदूरता, अस्निग्धता और अनुदारतारूप पन्द्रह दोषोंसे विमुक्त रखना परमावश्यक है।”

    मोक्ष पुरुषार्थ

सबसे पहले महाराज श्री कहते हैं। सबसे पहले तो यही समझना पड़ेगा कि आत्मा सच्चिदानंद स्वरूप है। जब यह जान जाएंगे तब हम अंदर आत्मा का अपना आराम अंदर दिव्य प्रकाश और अंदर शुद्ध आत्मा का सुंदर-सुंदर अनुभव कर पाएंगे। तब हम यह स्वभाविक रूप से बाहर का दिखावटी आराम मजा। बाहर का आनंद अपनऐ आप छोड़ देंगे। पर इसके लिए भोग भोगने की इच्छा Extrovert, त्याग, राग, रोष, भयमुक्त जीवन होना जरूरी है। इसके बाद इंद्रिय, मन और बुद्धि का परमात्मा में लगा देना जरूरी है

।खैर मोक्ष अंतिम पड़ाव है, यानी पीएचडी है। मैं नहीं समझता भी मोक्ष तक गाड़ी को पहुंचाना चाहिए। वरना तो निराशा हताशा हो जाएगी क्योंकि मोक्ष वाली कंडीशन तो कोई फुल फिल नहीं कर पा रहा है। अभी-अभी धर्म और अर्थ और फिर धर्म अर्थ दोनों से धर्म नियंत्रित काम का उपभोग करना चाहिए जिससे कम से कम यह जीवन सुखी बीते और भोग भी मोक्ष का मार्ग बन जाए। ऐसा काम करने पर फोकस करना चाहिए।

मोक्षको पुरुषार्थविहीनतासे बचानेके लिये पुत्रैषणा, वित्तैषणा, लोकैषणा, मलसहिष्णुता, विक्षेपसहिष्णुता, आवरणसहिष्णुता, प्रमाद, अहङ्कार, हरि-गुरुविमुखता, द्वैतसहिष्णुता, श्रवण-मनन-निदिध्यासनसे पराङ्मुखता, निर्गुण-निर्विशेषके अस्तित्वमें अनास्था, परमेश्वरकी परोक्षता, आत्माकी परिच्छिन्नता तथा असच्चिदानन्दरूपताकी मान्यतारूप पन्द्रह दोषोंका परित्याग परमावश्यक हैl
~अभिषेक गौड़ (आदित्य वाहिनी हाथरस)

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