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*महर्षि वाल्मीकि जी व वेदव्यास जी का परिचय* 🚩

*कुछ लोग बिना शास्त्र पढ़े सुनी सुनाई बातें सुनकर व्यासजी और वाल्मीकि जी को शूद्र कहते है ऐसे लोगों के लिए शास्त्र से प्रमाण* ✍

✍ *मैकाले की अनौरस संतान वामपंथियों ने भगवान् वाल्मीकि और व्यासजी को किरात-भील-मल्लाह आदि बना दिया है , जबकि यह शास्त्र विरुद्ध है।*

🚩 *आदिकवि भगवान् वाल्मीकि आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकि रामायण में स्वयं का परिचय देते हैं , वे किसी किरात-दस्यु कुलोत्पन्न नहीं थे , अपितु ब्रह्मर्षि भृगु के वंश में उत्पन्न ब्राह्मण थे । रामायण में भार्गव वाल्मीकि जी ने २४००० श्लोकों में श्रीराम उपाख्यान ‘रामायण’ लिखी ऐसा वर्णन है –*

“संनिबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विंशत्सहस्र कम् ! उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना !! ( वाल्मीकिरामायण ७/९४/२५)

🚩 *महाभारत में भी आदिकवि वाल्मीकि को भार्गव (भृगुकुलोद्भव) कहा है , और यही भार्गव रामायण के रचनाकार हैं –*

“श्लोकश्चापं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना !

आख्याते रामचरिते नृपति प्रति भारत !!” (महाभारत १२/५७/४०)

🚩 *शिवपुराण में यद्यपि उनको जन्मान्तर का चौर्य वृत्ति करने वाला बताया है तथापि वे भार्गव कुलोत्पन्न थे । भार्गव वंश में लोहजङ्घ नामक ब्राह्मण थे ,उन्ही का दूसरा नाम ऋक्ष था । ब्राह्मण होकर भी चौर्य आदि कर्म करते थे और श्रीनारदजी की सद् प्रेरणा से पुनः तपके द्वारा महर्षि हो गये ।*

“भार्गवान्वयसम्भवः !!

लोहजङ्घो द्विजो ह्यासीद् ऋक्षनामोन्तरो हि स: !

ब्राह्मीं वृत्तिं परित्यज्य चोर कर्म समाचरेत् ! नारदेनोपदिष्टस्तु तपोनिष्ठां समाश्रितः !!

🚩 *इत्यादि वचनों से भृंगु वंश में उत्पन्न लोहजगङ्घ ब्राह्मण जिसे ऋक्ष भी कहते थे , ब्राह्मण वृत्ति त्यागकर चोरी करने लगा था , फिर नारदजी की प्रेरणा से तप करके पुनः ब्रह्मर्षि हो गये ।*

🚩 *उन्हें किरात-भील कुलोत्पन्न कहना अपराध है । २४ वे त्रेतायुगमें भगवान् श्रीराम हुए तब रामायण की रचनाकर आदिकवि के रूप में प्रसिद्ध हुए ।*

🚩 *विष्णुपुराण में इन्हीं भृगुकुलोद्भव ऋभु वाल्मीकिजी को २४ वे द्वापर युग में वेदों का विस्तार करने वाले २४वे व्याजजी कहा है –*

“ऋक्षोऽभूद्भार्गववस्तस्माद्वाल्मीकिर्योऽभिधीयते (विष्णु०३/३/१८) ।

🚩 *यही भार्गव ऋभु २४ वे व्यासजी पुनः ब्रह्माजी के पुत्र प्राचेतस वाल्मीकि हुए ।*

*श्रीमद्वाल्मीकि रामायण में वाल्मीकि भगवान् श्रीरामचन्द्र को अपना परिचय देते हैं –*

“प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन ! (वाल्मीकिरामायण ७/९६/१८)

*स्वयं को प्रचेता का दशवाँ पुत्र वाल्मीकि कहा है ।*

ब्रह्मवैवर्तपुराणमें कहा है –

” कति कल्पान्तरेऽतीते स्रष्टु: सृष्टिविधौ पुनः !

य: पुत्रश्चेतसो धातु: बभूव मुनिपुङ्गव: !!

तेन प्रचेता इति च नाम चक्रे पितामह: !

🚩 *अर्थात् कल्पान्तरों के बीतने पर सृष्टा के नवीन सृष्टि विधान में ब्रह्मा के चेतस से जो पुत्र उत्पन्न हुआ , उसे ही ब्रह्मा के प्रकृष्ट चित्त से आविर्भूत होने के कारण प्रचेता कहा गया है ।*

🚩 *इसीलिए ब्रह्मा के चेतस से उत्पन्न दशपुत्रों में वाल्मीकि जी प्राचेतस प्रसिद्ध हुए ।*

🚩 *मनु स्मृति में वर्णन है ब्रह्माजी ने प्रचेता आदि दश पुत्र उत्पन्न किये –*

“अहं प्रजाः सिसृक्षुस्तु तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम् ! पतीत् प्रजानामसृजं महर्षीनादितो दश !! मरीचिमत्र्यङ्गिरसौ पुलसत्यं पुलहं क्रतुम् ! प्रचेतसं वसिष्ठं च भृगुं नारदमेव च !! (मनु०१/३४-३५)

🚩 *भगवान् वाल्मीकि जन्मान्तर में भी ब्राह्मण (भार्गव) थे और आदिकवि वाल्मीकि जी के जन्म में भी (प्राचेतस) ब्राह्मण थे !*

🚩 *शिवपुराण में कहा है प्राचेतस वाल्मीकि ब्रह्मा के पुत्र ने श्रीमद्रामायण की रचना की ।*

” पुरा स्वायम्भुवो ह्यासीत् प्राचेतस महाद्युतिः ! ब्रह्मात्मजस्तु ब्रह्मर्षि तेन रामायणं कृतम् !! ”

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*वेदव्यास जी का परिचय*

🚩 *महाभारतकार भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासजी भील-मल्लाह नहीं वासिष्ठकुलोद्भव थे । व्यासजी की माता सत्यवती अमावसु पितृ की मानसी कन्या अच्छोदा थीं , जिनका पितृलोक से पतन होकर मर्त्यलोक में कुरुवंशी महाराज चैद्योपरिचर वसु की कन्या मत्स्य गन्धा के रूपमें जन्मी थीं ।*

🚩 *व्यासजी के पिता महर्षि पराशर भगवान् वसिष्ठ के पौत्र और शक्ति के पुत्र थे ।*

*भगवान् व्यासजी की माता सत्यवती भीष्मजी से कहती हैं –*

“यस्तु राजा वसुर्नाम श्रुतास्ते भरतर्षभ !

तस्य शुक्रादहं मत्स्याद् धृताकुक्षौ पुरा किला !!

मातरं मे जलाद् धृत्वा दाश: परमधर्मवित् !

मां तु स्वगृहमानीय दुहितृत्वे ह्यकल्पयत् !!

(महाभारत आदि पर्व १०४-६)

🚩 *भरत श्रेष्ठ ! तुमने महाराज वसु का नाम सुना होगा । पूर्वकाल में मैं उन्हीं के वीर्य से उत्पन्न हुई थी । मुझे एक मछली ने अपने पेट में धारण किया था (इसीलिये मत्स्य की गन्ध उनके शरीर से आती थी जिससे उनका नाम मत्स्य गन्धा प्रसिद्ध था ) ।*

🚩 *एक परम् धर्मज्ञ मल्लाह ने जल से मेरी माता को पकड़ा , उसके पेट से मुझे निकाला और अपने घर लाकर अपनी पुत्री बनाकर रखा !”*

🚩 *इस वृत्तान्त से माता सत्यवती कुरुवंशी महाराज उपरिचरि वसु की औरस पुत्री सिद्ध होती हैं , जिन्हें दाशराज मल्लाह ने पालके बड़ा किया था ।*

🚩 *इन्हीं मत्स्य गन्धा से महर्षि पराशर ने कन्यावस्था में व्यासजी को उत्पन्न किया था ।*

“पराशर्यो महायोगी स बभूव महानृषि: !

कन्यापुत्रो मम पुरा द्वैपायन इति श्रुतः !!” (आदिपर्व०१०४/१४)

🚩 *भगवान् व्यासजी की माता क्षत्रिय राजा वसुपुत्री थीं और पिता महर्षि पराशर वासिष्ठ ब्राह्मण थे , फिर व्यासजी को मल्लाह , केवट , निषाद कहना निरीह मूर्खता ही नहीं , महान् अपराध भी है ।*

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