Sanatan Dharma

तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम्

हेमलता – ०१

तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम्

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥०१॥

अर्थ – देवी को प्रणाम है। महादेवी को प्रणाम है। शिवा को निरन्तर प्रणाम है। प्रकृति को प्रणाम है। भद्रा को प्रणाम है। हम निश्चयपूर्वक एकाग्रचित्त से आपके समक्ष विनीत हैं।

श्रीमन्निग्रहाचार्यकृता हेमलताटीका

दीव्यति आनन्देन क्रीडतीति स्त्रीविवक्षया देवी। देवी दिवो दुहितरेति श्रुतिः। ज्ञानानां चिन्मयानन्देति श्रुतिः। यथोक्तमस्ति ऋग्वेदे – उषा याति ज्योतिषा बाधमाना विश्वा तमांसि दुरिताप देवी। प्र णो देवी सरस्वतीति श्रुतिः। देवीं वाचमजनयन्त देवा इत्याथर्वणे। महती पूजिता विश्वे मूलप्रकृतिरीश्वरी तस्मान्महादेवीति। यथोक्तमस्ति देवीपुराणे –

पूज्यते या सुरैः सर्वैर्महांश्चैव प्रमाणतः।
धातुर्महेति पूजायां महादेवी ततः स्मृता॥

सा ब्रह्मरूपशिवलिङ्गधारिणी। यथा लिङ्गे –

लिङ्गवेदी महादेवी लिङ्गं साक्षान्महेश्वरः।
लयनाल्लिङ्गमित्युक्तं तत्रैव निखिलं सुराः॥

पुनः शिवा च। यथोक्तं ब्रह्मवैवर्ते –

शिवा कल्याणरूपा च शिवदा च शिवप्रिया।
प्रिये दातरि चाशब्दः शिवा तेन प्रकीर्तिता॥

तस्मिन्नेवोच्यते पुनः –

शश्च कल्याणवचन इरेवोत्कृष्टवाचकः।
समूहवाचकश्चैव वाकारो दातृवाचकः॥
श्रेयःसङ्घोत्कृष्टदात्री शिवा तेन प्रकीर्तिता।
शिवराशिर्मूर्तिमती शिवा तेन प्रकीर्तिता॥
शिवो हि मोक्षवचनश्चाकारो दातृवाचकः।

स्वयं निर्वाणदात्री या सा शिवा परिकीर्तिता॥

देवीपुराणेऽपि –

शिवा मुक्तिः समाख्याता योगिनां मोक्षगामिनी।
शिवाय यां जपेद्देवीं शिवा लोके ततः स्मृता॥

वाममार्गे शुभाशुभपरिज्ञानहेतवे शिवाबलिरुक्ता। यथा तन्त्रसारे मन्त्रः –

गृह्ण देवि महाभागे शिवे कालाग्निरूपिणि।
शुभाशुभफलं व्यक्तं ब्रूहि गृह्ण बलिं तव॥

कल्याणकारिणी शिवाख्या भवति। यथाथर्वणे –

शिवा भव पुरुषेभ्यो गोभ्यो अश्वेभ्यः शिवा।
शिवास्मै सर्वस्मै क्षेत्राय शिवा न इहैधि॥

तस्मिन्नेवोच्यते पुनः – शिवा नः शं सन्त्वायुषे शिवा भवन्तु मातरः।

यजुषामपि श्रुतिः – या ते रुद्र शिवा तनूः शिवा विश्वाहा भेषजी। शिवा रुद्रस्य (रुतस्य) भेषजी।

ततः प्रकृतिः। निर्गुणा सगुणा च। अत्र वै निर्गुणा प्रोक्ता गुणातीता परात्परा। न तया क्रियते सृष्टिर्न लयो वा गुणात्मकः॥ सृष्टिकर्मणि सगुणा पञ्चधा श्रीमद्देवीभागवते ब्रह्मवैवर्ते च –

गणेशजननी दुर्गा राधा लक्ष्मीः सरस्वती।
सावित्री च सृष्टिविधौ प्रकृतिः पञ्चमी स्मृता॥

श्रीमद्भगवद्गीतायामपरा प्रकृतिरष्टधा च –

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥

तत्रैवाग्रे परा प्रोक्ता –
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥

स्वात्मनि त्रिगुणं दधाति, यथा मात्स्ये –

सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणत्रयमुदाहृतम्।
साम्यावस्थितिरेतेषां प्रकृतिः परिकीर्तिता॥

अस्या निरुक्तिर्ब्रह्मवैवर्ते –

प्रकृष्टवाचकः प्रश्च कृतिश्च सृष्टिवाचकः।
सृष्टौ प्रकृष्टा या देवी प्रकृतिः सा प्रकीर्तिता॥
गुणे प्रकृष्टे सत्त्वे च प्रशब्दो वर्तते श्रुतौ।
मध्यमे रजसि कृश्च तिशब्दस्तामसः स्मृतः॥
त्रिगुणात्मस्वरूपा या सर्वशक्तिसमन्विता।
प्रधाना सृष्टिकरणे प्रकृतिस्तेन कथ्यते॥
प्रथमे वर्तते प्रश्च कृतिश्च सृष्टिवाचकः।
सृष्टेराद्या च या देवी प्रकृतिः सा प्रकीर्तिता॥

चान्ते भद्रा। भद्रमिति कल्याणं मङ्गलं वा। सर्वजीवकल्याणवाचिका भद्रा। रक्षणार्थं वा भद्रा रक्षणशक्तिः। यथाथर्वणे भद्रा शक्तिर्यजमानाय सुन्वत इति।

अर्थ – जो प्रकाशित होती है, आनन्द से क्रीडा करती है, उसमें स्त्रीविवक्षा से देवी शब्द की भावना होती है। श्रुति कहती है – देवी आकाश अथवा स्वर्ग की पुत्री है। ज्ञानमण्डल की चिदानन्दस्वरूपिणी है। जैसा कि ऋग्वेद में कहते हैं – उषा नाम वाली देवी अपने प्रकाश से विश्व के अन्धकार को नष्ट करती है। श्रुति कहती है कि हम दिव्य स्वरूप वाली नित्य प्रवाहमयी देवी को निश्चय ही प्रणाम करते हैं। अथर्ववेद में कहते हैं – देवताओं ने वाक्शक्तिरूपिणी देवी को प्रकट किया।

जो महान् है, मूलप्रकृति और सबकी स्वामिनी है, विश्व में सबों से पूजित है, वह महादेवी है। जैसा कि देवीपुराण में कहा गया है – जो सबों से महान् है, देवताओं के द्वारा जिसकी पूजा होती है, ‘मह’ धातु का पूजा के अर्थ में प्रयोग होता है, अतः उन्हें महादेवी कहते हैं। वह महादेवी परब्रह्मरूपी शिवलिङ्ग को धारण करने वाली है। जैसा कि लिङ्गपुराण में कहते हैं – लिङ्ग की वेदी (आधार) महादेवी हैं और लिङ्ग साक्षात् महान् ईश्वर हैं। सबों को अपने अन्दर समाहित करने से उसका नाम लिङ्ग है और वहीं सभी देवता रहते हैं।

फिर उन्हें शिवा कहा। जैसा कि ब्रह्मवैवर्तपुराण में कहा गया है – शिवजी की प्रिया, कल्याणमयी, कल्याण देने वाली है, प्रिय और दान के अर्थ में यह शब्द है अतः उनका नाम शिवा है। उसी ग्रन्थ में पुनः कहते हैं – शिवा शब्द में ‘श’ का अर्थ कल्याण है, ‘इ’ का अर्थ उत्कृष्ट समूह है, ‘वा’ का अर्थ देने वाला है। जो कल्याण का उत्तम समूह प्रदान करे, उसे शिवा कहते हैं। यह साक्षात् कल्याण का भण्डार हैं, अतः शिवा कहाती हैं। शिव शब्द कल्याण का वाचक है एवं ‘आ’ प्रदान करने का वाचक है। जो परम कल्याण अर्थात् निर्वाण मोक्ष देने वाली हैं, उन्हें शिवा कहते हैं।

देवीपुराण में भी कहते हैं – योगियों को मोक्षमार्ग में भेजने वाली मुक्ति को शिवा कहते हैं। कल्याण के निमित्त देवी का जप करना चाहिए, अतः उन्हें संसार में शिवा कहते हैं। वाममार्ग में शुभाशुभ के ज्ञान की सिद्धि हेतु शिवाबलि बतायी गयी है। इसका मन्त्र तन्त्रसार में है – हे महाभाग्यवती देवि ! हे कालाग्नि के समान विकट स्वरूप वाली ! हे शिवे ! अपने निमित्त दी जा रही बलि को स्वीकार करो और मुझे शुभाशुभ का फल बताओ।

कल्याण करने वाली को शिवा कहते हैं। जैसा कि अथर्ववेद में है – मनुष्यों का कल्याण हो। गायों और घोड़ों का कल्याण हो। मेरा और बाकी सबों का भी कल्याण हो। उसी ग्रन्थ में पुनः कहते हैं कि मातृकागण हमारी आयु के लिए कल्याणकारिणी हों। यजुर्वेद में भी श्रुति है – जो जो शिवजी के कल्याणकारी शरीर हैं, वे सब संसार के कष्ट और दुःख की चिकित्सा करें।

उसके बाद प्रकृति के विषय में कहा। यह निर्गुणा और सगुणा होती है। यहाँ निर्गुणा उसे कहते हैं जो सबों से परे और गुणों से अतीत है। उसके द्वारा गुणात्मक रचना या संहार का कार्य नहीं किया जाता। सृष्टि के कार्य में सगुणा पांच प्रकार की हो जाती है। श्रीमद्देवीभागवत और ब्रह्मवैवर्तपुराण में कहते हैं – गणेशजी की माता दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री, इस प्रकार सृष्टि के समय प्रकृति पांच प्रकार की कही गयी है।

श्रीमद्भगवद्गीता में आठ प्रकार की अपरा प्रकृति बतायी गयी है – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि एवं अहङ्कार, ये मेरी (भगवान् की) आठ प्रकारों में विभाजित प्रकृति है। वहीं पर आगे पराप्रकृति के विषय में बताया – हे महाबाहो ! जो इन से भिन्न चेतनात्मिका है, उसे मेरी पराप्रकृति जानो, जिसके द्वारा यह संसार धारण किया जाता है।

यह अपने भीतर तीनों गुणों को धारण करती है। जैसा कि मत्स्यपुराण में वर्णन है – सात्विक, राजस और तामस, ये तीन गुण बताए गए हैं। इन तीनों की साम्यावस्था को प्रकृति कहते हैं। इसके नाम का रहस्य ब्रह्मवैवर्तपुराण में कहते हैं – ‘प्र’ का अर्थ प्रकृष्ट है। कृति का अर्थ सृष्टि है। जो सृष्टि करने में प्रकृष्ट (सर्वोत्तम) है, उस देवी को प्रकृति कहते हैं। उत्तम गुण सत्वगुण है, उसके निमित्त वेद में ‘प्र’ शब्द बताया गया है। मध्यम गुण रजोगुण है, उसके लिए ‘कृ’ शब्द है। ‘ति’ शब्द से तमोगुण बताया गया है। इस प्रकार तीनों गुणों से युक्त स्वरूप वाली, जिसमें सभी शक्तियों का समन्वय है, वह सृष्टिकार्य में प्रधान होने से प्रकृति कहलाती है। दूसरा अर्थ यह है कि ‘प्र’ शब्द प्रथम का द्योतक है और सृष्टि को कृति कहते हैं। जो देवी सृष्टि से पहले भी रहती हैं, उन्हें प्रकृति कहते हैं।

सबसे अन्त में भद्रा कहा। भद्र का अर्थ कल्याण या मङ्गल है। सभी जीवों के कल्याण का वाचन करने वाली भद्रा है। रक्षा के अर्थ में भी भद्रा रक्षणशक्ति के रूप में बतायी जाती है। जैसा कि अथर्ववेद में कहा – भद्रा (रक्षा या कल्याणकारिणी) शक्ति यजमान के निमित्त आप्लावन (विस्तार) करती है। इस प्रकार अर्थ है।<span;>हेमलता – ०१

तन्त्रोक्तं देवीसूक्तम्

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥०१॥

अर्थ – देवी को प्रणाम है। महादेवी को प्रणाम है। शिवा को निरन्तर प्रणाम है। प्रकृति को प्रणाम है। भद्रा को प्रणाम है। हम निश्चयपूर्वक एकाग्रचित्त से आपके समक्ष विनीत हैं।

श्रीमन्निग्रहाचार्यकृता हेमलताटीका

दीव्यति आनन्देन क्रीडतीति स्त्रीविवक्षया देवी। देवी दिवो दुहितरेति श्रुतिः। ज्ञानानां चिन्मयानन्देति श्रुतिः। यथोक्तमस्ति ऋग्वेदे – उषा याति ज्योतिषा बाधमाना विश्वा तमांसि दुरिताप देवी। प्र णो देवी सरस्वतीति श्रुतिः। देवीं वाचमजनयन्त देवा इत्याथर्वणे। महती पूजिता विश्वे मूलप्रकृतिरीश्वरी तस्मान्महादेवीति। यथोक्तमस्ति देवीपुराणे –

पूज्यते या सुरैः सर्वैर्महांश्चैव प्रमाणतः।
धातुर्महेति पूजायां महादेवी ततः स्मृता॥

सा ब्रह्मरूपशिवलिङ्गधारिणी। यथा लिङ्गे –

लिङ्गवेदी महादेवी लिङ्गं साक्षान्महेश्वरःलयनाल्लिङ्गमित्युक्तं तत्रैव निखिलं सुराः॥

पुनः शिवा च। यथोक्तं ब्रह्मवैवर्ते –

शिवा कल्याणरूपा च शिवदा च शिवप्रिया।
प्रिये दातरि चाशब्दः शिवा तेन प्रकीर्तिता॥

तस्मिन्नेवोच्यते पुनः –

शश्च कल्याणवचन इरेवोत्कृष्टवाचकः।
समूहवाचकश्चैव वाकारो दातृवाचकः॥
श्रेयःसङ्घोत्कृष्टदात्री शिवा तेन प्रकीर्तिता।
शिवराशिर्मूर्तिमती शिवा तेन प्रकीर्तिता॥
शिवो हि मोक्षवचनश्चाकारो दातृवाचकः।
स्वयं निर्वाणदात्री या सा शिवा परिकीर्तिता॥

देवीपुराणेऽपि –

शिवा मुक्तिः समाख्याता योगिनां मोक्षगामिनी।
शिवाय यां जपेद्देवीं शिवा लोके ततः स्मृता॥

वाममार्गे शुभाशुभपरिज्ञानहेतवे शिवाबलिरुक्ता। यथा तन्त्रसारे मन्त्रः –

गृह्ण देवि महाभागे शिवे कालाग्निरूपिणि।
शुभाशुभफलं व्यक्तं ब्रूहि गृह्ण बलिं तव॥

कल्याणकारिणी शिवाख्या भवति। यथाथर्वणे –

शिवा भव पुरुषेभ्यो गोभ्यो अश्वेभ्यः शिवा।
शिवास्मै सर्वस्मै क्षेत्राय शिवा न इहैधि॥

तस्मिन्नेवोच्यते पुनः – शिवा नः शं सन्त्वायुषे शिवा भवन्तु मातरः।

यजुषामपि श्रुतिः – या ते रुद्र शिवा तनूः शिवा विश्वाहा भेषजी। शिवा रुद्रस्य (रुतस्य) भेषजी।

ततः प्रकृतिः। निर्गुणा सगुणा च। अत्र वै निर्गुणा प्रोक्ता गुणातीता परात्परा। न तया क्रियते सृष्टिर्न लयो वा गुणात्मकः॥ सृष्टिकर्मणि सगुणा पञ्चधा श्रीमद्देवीभागवते ब्रह्मवैवर्ते च –

गणेशजननी दुर्गा राधा लक्ष्मीः सरस्वती।
सावित्री च सृष्टिविधौ प्रकृतिः पञ्चमी स्मृता॥

श्रीमद्भगवद्गीतायामपरा प्रकृतिरष्टधा च –

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥

तत्रैवाग्रे परा प्रोक्ता –

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥

स्वात्मनि त्रिगुणं दधाति, यथा मात्स्ये –

सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणत्रयमुदाहृतम्।

अस्या निरुक्तिर्ब्रह्मवैवर्ते –

प्रकृष्टवाचकः प्रश्च कृतिश्च सृष्टिवाचकः।
सृष्टौ प्रकृष्टा या देवी प्रकृतिः सा प्रकीर्तिता॥
गुणे प्रकृष्टे सत्त्वे च प्रशब्दो वर्तते श्रुतौ।
मध्यमे रजसि कृश्च तिशब्दस्तामसः स्मृतः॥
त्रिगुणात्मस्वरूपा या सर्वशक्तिसमन्विता।
प्रधाना सृष्टिकरणे प्रकृतिस्तेन कथ्यते॥
प्रथमे वर्तते प्रश्च कृतिश्च सृष्टिवाचकः।
सृष्टेराद्या च या देवी प्रकृतिः सा प्रकीर्तिता॥

चान्ते भद्रा। भद्रमिति कल्याणं मङ्गलं वा। सर्वजीवकल्याणवाचिका भद्रा। रक्षणार्थं वा भद्रा रक्षणशक्तिः। यथाथर्वणे भद्रा शक्तिर्यजमानाय सुन्वत इति।

अर्थ – जो प्रकाशित होती है, आनन्द से क्रीडा करती है, उसमें स्त्रीविवक्षा से देवी शब्द की भावना होती है। श्रुति कहती है – देवी आकाश अथवा स्वर्ग की पुत्री है। ज्ञानमण्डल की चिदानन्दस्वरूपिणी है। जैसा कि ऋग्वेद में कहते हैं – उषा नाम वाली देवी अपने प्रकाश से विश्व के अन्धकार को नष्ट करती है। श्रुति कहती है कि हम दिव्य स्वरूप वाली नित्य प्रवाहमयी देवी को निश्चय ही प्रणाम करते हैं। अथर्ववेद में कहते हैं – देवताओं ने वाक्शक्तिरूपिणी देवी को प्रकट किया।

जो महान् है, मूलप्रकृति और सबकी स्वामिनी है, विश्व में सबों से पूजित है, वह महादेवी है। जैसा कि देवीपुराण में कहा गया है – जो सबों से महान् है, देवताओं के द्वारा जिसकी पूजा होती है, ‘मह’ धातु का पूजा के अर्थ में प्रयोग होता है, अतः उन्हें महादेवी कहते हैं। वह महादेवी परब्रह्मरूपी शिवलिङ्ग को धारण करने वाली है। जैसा कि लिङ्गपुराण में कहते हैं – लिङ्ग की वेदी (आधार) महादेवी हैं और लिङ्ग साक्षात् महान् ईश्वर हैं। सबों को अपने अन्दर समाहित करने से उसका नाम लिङ्ग है और वहीं सभी देवता रहते हैं।

फिर उन्हें शिवा कहा। जैसा कि ब्रह्मवैवर्तपुराण में कहा गया है – शिवजी की प्रिया, कल्याणमयी, कल्याण देने वाली है, प्रिय और दान के अर्थ में यह शब्द है अतः उनका नाम शिवा है। उसी ग्रन्थ में पुनः कहते हैं – शिवा शब्द में ‘श’ का अर्थ कल्याण है, ‘इ’ का अर्थ उत्कृष्ट समूह है, ‘वा’ का अर्थ देने वाला है। जो कल्याण का उत्तम समूह प्रदान करे, उसे शिवा कहते हैं। यह साक्षात् कल्याण का भण्डार हैं, अतः शिवा कहाती हैं। शिव शब्द कल्याण का वाचक है एवं ‘आ’ प्रदान करने का वाचक है। जो परम कल्याण अर्थात् निर्वाण मोक्ष देने वाली हैं, उन्हें शिवा कहते हैं।

देवीपुराण में भी कहते हैं – योगियों को मोक्षमार्ग में भेजने वाली मुक्ति को शिवा कहते हैं। कल्याण के निमित्त देवी का जप करना चाहिए, अतः उन्हें संसार में शिवा कहते हैं। वाममार्ग में शुभाशुभ के ज्ञान की सिद्धि हेतु शिवाबलि बतायी गयी है। इसका मन्त्र तन्त्रसार में है – हे महाभाग्यवती देवि ! हे कालाग्नि के समान विकट स्वरूप वाली ! हे शिवे ! अपने निमित्त दी जा रही बलि को स्वीकार करो और मुझे शुभाशुभ का फल बताओ।

कल्याण करने वाली को शिवा कहते हैं। जैसा कि अथर्ववेद में है – मनुष्यों का कल्याण हो। गायों और घोड़ों का कल्याण हो। मेरा और बाकी सबों का भी कल्याण हो। उसी ग्रन्थ में पुनः कहते हैं कि मातृकागण हमारी आयु के लिए कल्याणकारिणी हों। यजुर्वेद में भी श्रुति है – जो जो शिवजी के कल्याणकारी शरीर हैं, वे सब संसार के कष्ट और दुःख की चिकित्सा करें।

उसके बाद प्रकृति के विषय में कहा। यह निर्गुणा और सगुणा होती है। यहाँ निर्गुणा उसे कहते हैं जो सबों से परे और गुणों से अतीत है। उसके द्वारा गुणात्मक रचना या संहार का कार्य नहीं किया जाता। सृष्टि के कार्य में सगुणा पांच प्रकार की हो जाती है। श्रीमद्देवीभागवत और ब्रह्मवैवर्तपुराण में कहते हैं – गणेशजी की माता दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री, इस प्रकार सृष्टि के समय प्रकृति पांच प्रकार की कही गयी है।

श्रीमद्भगवद्गीता में आठ प्रकार की अपरा प्रकृति बतायी गयी है – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि एवं अहङ्कार, ये मेरी (भगवान् की) आठ प्रकारों में विभाजित प्रकृति है। वहीं पर आगे पराप्रकृति के विषय में बताया – हे महाबाहो ! जो इन से भिन्न चेतनात्मिका है, उसे मेरी पराप्रकृति जानो, जिसके द्वारा यह संसार धारण किया जाता है।

यह अपने भीतर तीनों गुणों को धारण करती है। जैसा कि मत्स्यपुराण में वर्णन है – सात्विक, राजस और तामस, ये तीन गुण बताए गए हैं। इन तीनों की साम्यावस्था को प्रकृति कहते हैं। इसके नाम का रहस्य ब्रह्मवैवर्तपुराण में कहते हैं – ‘प्र’ का अर्थ प्रकृष्ट है। कृति का अर्थ सृष्टि है। जो सृष्टि करने में प्रकृष्ट (सर्वोत्तम) है, उस देवी को प्रकृति कहते हैं। उत्तम गुण सत्वगुण है, उसके निमित्त वेद में ‘प्र’ शब्द बताया गया है। मध्यम गुण रजोगुण है, उसके लिए ‘कृ’ शब्द है। ‘ति’ शब्द से तमोगुण बताया गया है। इस प्रकार तीनों गुणों से युक्त स्वरूप वाली, जिसमें सभी शक्तियों का समन्वय है, वह सृष्टिकार्य में प्रधान होने से प्रकृति कहलाती है। दूसरा अर्थ यह है कि ‘प्र’ शब्द प्रथम का द्योतक है और सृष्टि को कृति कहते हैं। जो देवी सृष्टि से पहले भी रहती हैं, उन्हें प्रकृति कहते हैं।

सबसे अन्त में भद्रा कहा। भद्र का अर्थ कल्याण या मङ्गल है। सभी जीवों के कल्याण का वाचन करने वाली भद्रा है। रक्षा के अर्थ में भी भद्रा रक्षणशक्ति के रूप में बतायी जाती है। जैसा कि अथर्ववेद में कहा – भद्रा (रक्षा या कल्याणकारिणी) शक्ति यजमान के निमित्त आप्लावन (विस्तार) करती है। इस प्रकार अर्थ है।

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